यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ।
अर्थात तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू फल की दृष्टि से कर्म मत कर और न ही ऐसा सोच की फल की आशा के बिना कर्म क्यों करूं |
इस श्लोक में चार तत्त्व हैं:
क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
श्री ब्रह्मशंकर शास्त्री ने उपनिषद , भारतीय दार्शनिक ग्रन्थों ब्रह्मसूत्र आदि ) तथा श्रीमद्भगवद्गीता जैसे मूलभूत आध्यात्मिक ग्रन्थों पर 100 से अधिक पुस्तके लिखी हैं । जिनमें श्रीमद्भगवद्गीता पर सरल भाषा में लिखा गया 21 खण्डों का भाष्य विशिष्ट है । श्रीमद्भगवद्गीता के 21 खण्डों के भाष्य सहित 42 पुस्तकों के प्रकाशन की व्यवस्था कृष्णा चैरिटेबिल सोसाइटी ” द्वारा की जा रही है । आज तक श्रीमद्भगवद्गीता को विश्व के किसी विद्वान ने सम्पूर्णता से प्रवचन रूप में व्याख्यापित किये जाने का कार्य नहीं किया या , इस कारण शास्त्री जी ने “ सम्पूर्ण गीता प्रवचन ” नाम से श्री गीता जी पर 700 घण्टों का एक बृहद् विस्तृत कार्यक्रम प्रस्तुत किया है । गीता जी के प्रवचनों की श्रृंखला तया प्रकाशित हो रही पुस्तकों का विवरण पुस्तक के साथ संलग्न है । आशा है साधक लाभान्वित होगें ।