ब्रम्हाशंकर शास्त्री के 54 विशिष्ट ग्रन्थ

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श्रीमद्भगवद्‌गीता भाष्य के 21 खंड:

1 -

विषादयोग : ।

भगवद्गीता के प्रथम अध्याय की व्याख्या , जिसमें अर्जुन को अपने स्वजनों को देखकर गोह उत्पन्न हुआ था और उसने युद्ध से विरत होने की इच्छा की थी ।

2 -

सांख्योग ( प्रथम सपखण्ड ) : ।

इस उपखण्ड में भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक संख्या - 1 से 38 श्लोकों की व्याख्या की गयी हैं । जिसमें जीवात्मा के विशिष्ट गुण तथा कर्मण्येवाधिकारस्ते की विशिष्ट व्याख्या प्रस्तुत की गयी है ।

3 -

सांख्ययोग ( द्वितीय उपखण्ड ) : ।

इस उपखण्ड में भगवदगीता के 30वें श्लोक से 72 श्लोक तक की व्याख्या है , जिसमें स्थिरपड पुरुष के बारे में विशेष रूप से वर्णन किया गया है । यह गीता का विशिष्ट अध्याय है ।

4 -

कर्मयोग : ।

इस खण्ड में भगवतगीता के तीसरे अध्याय की व्याख्या की गयी है, जो कर्मयोग विषयक है। इसलिए इस अध्याय को कर्मयोग कहा जाता है ।

5 -

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग : ।

इस खण्ड में भगवद्गीता के चौथे अध्याय की व्याख्या की गयी है , जो कर्म तशा संन्यास का मिश्रित रूप है । इसी अध्याय ने श्रीभगवान ने अपने प्रकटीकरण की प्रक्रिया का विशेष उल्लेख किया है ।

6 -

कर्मसंन्यासयोग : ।

इस खण्ड में भगवदगीता के 5वें अध्याय की व्याख्या है जो सांख्ययोग के विषय में निरुपित की गयी है । इसमें श्रीभगवान ने सांख्य विषय को विशेषता से प्रतिपादित किया ।

7 -

आत्मसंयमयोग ( ध्यानयोग ) : ।

इस खण्ड में भगवदगीता के छठवें अध्याय की व्याख्या की गयी है जिसमें आत्मसंयम और ध्यान के विषय का विशिष्ट वर्णन है

8 -

ज्ञानविज्ञानयोग : ।

इस खण्ड में भगवद्गीता के सातवें अध्याय की व्याख्या की गयी है । श्री भगवान ने माया के स्वरूप और उसकी विशेषता को विशेष रूप से प्रतिपादित किया है ।

9 -

अक्षरब्रह्मयोग : ।

इस खण्ड में भगवतगीता के आठवें अध्याय की व्याख्या की गयी है तथा अर्जुन के द्वारा पूछे गये ६ प्रश्नों ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्म क्या है ? और अधिदैव क्या है ? और अधिभूत क्या है ? तथा अधियज्ञ क्या है ? इस विषय को विशेष रूप से श्रीभगवान के द्वारा निरुपित किया गया है ।

10 -

राजविद्याराजगुह्ययोग : ।

इस खण्ड में गीता के ९वें अध्याय की व्याख्या की गयी है । जिसमें श्रीभगवान ने सकाम व निष्काम उपासना का विशेष रूप से वर्णन किया है ।

11 -

विभूतियोग : ।

इस खण्ड में गीता के दसवें अध्याय की व्याख्या की गयी है । श्रीभगवान ने इस अध्याय में अपनी विभूतियों को विशेष रूप से वर्णित किया है ।

12 -

विश्वरूपदर्शनयोग ( उपखण्ड एक ) : ।

इस उपखण्ड में भागवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के 1 से 25 श्लोकों की व्याख्या की गयी है तथा भगवान के विराट स्वरूप का विशेष वर्णन किया गया है ।

13 -

विश्वरूपदर्शनयोग ( उपखण्ड दो ) : ।

इस उपखण्ड में भगवद्गीता के शेष श्लोकों अर्थात् 26 से 55 श्लोकों की व्याख्या की गयी है तथा श्रीभगवान ने अपने चतुर्भुज स्वरूप को भी दिखाया है ।

14 -

भक्तियोग : ।

इस खण्ड में भगवद्गीता के 12वें अध्याय की व्याख्या की गयी है । श्रीभगवान ने अपने भक्तों के विशिष्ट गुणों का वर्णन किया है ।

15 -

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग : ।

इस खंड में भगवद्गीता के 13वें अध्याय की व्याख्या की गयी है तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को विशेष रूप से वर्णित किया गया है और परमात्मा के विशेष गुणों का वर्णन हुआ है।

16 -

गुणत्रयविभागयोग : ।

इस खण्ड में गीता के 14वें अध्याय की व्याख्या की गयी है तथा तीन गुणो सत्त्व रज , तम का वर्णन हुआ है तथा त्रिगुणों से अतीत पुरुष के बारे में विशेष व्याख्या हुई है ।

17 -

पुरुषोत्तमयोग : ।

इस खण्ड में गीता के 15वें अध्याय की व्याख्या की गयी है और संसार को वृक्ष मानकर परमात्मा की अनुभूति का विशेष वर्णन किया गया है ।

18 -

दैवसुरसम्पविभागयोग : ।

इस खण्ड में गीता के 16वें अध्याय की व्याख्या की गयी है तथा दैवी और आसुरी स्वभाव के पुरुषों का विशेष वर्णन किया गया है ।

19 -

श्रद्धात्रयविभागयोग : ।

इस खण्ड में गीता के 17वें अध्याय की व्याख्या की गयी है तथा तीन प्रकार के आहार यज्ञ, तप और दान आदि के बारे में वर्णन हुआ है और श्रीभगवान के ओऽम तत्सत् नाम का कथन है।

20 -

मोक्षसंन्यासयोग ( उपखण्ड एक ) : ।

इस उपखण्ड में भगवदगीता के 18वें अध्याय के श्लोक संख्या - 1 से 40 श्लोकों की व्याख्या हुई है , जिसमें तीन प्रकार के त्याग, कर्ता, ज्ञान, बुद्धि, सुख आदि के बारे में निरूपण किया गया है|

21 -

मोक्षसंन्यासयोग ( उपखण्ड दो ) : ।

इस उपखण्ड में गीता के 18वें अध्याय के श्लोक संख्या - 41 से 78 श्लोक तक की व्याख्या हुई है तथा सर्वधर्मान्यपरित्यज्य जैसे श्लोकों का वर्णन है ।

22 -

मुक्ति का सहज उपाय : ।

इस पुस्तक में परमात्मा की अनुभूति की प्रक्रिया के साथ मन, बुद्धि और अहंकार तथा जीवात्मा के स्वरूप का विशेष वर्णन किया गया है । इस पुस्तक के अध्ययन के पश्चात् मनुष्य को पर्याप्त आध्यात्मिक ज्ञान हो जाता है ।

23 -

कर्म और भाग्य : ।

इस पुस्तक में कर्म और भाग्य के विषय में विशेष वर्णन किया गया है । वस्तुतः हमारा भाग्य हमारे द्वारा किये गये कर्म के आधार पर ही बनता है । यह निश्चित सिद्धान्त है । इसी तथ्य का वर्णन इस पुस्तक में हुआ है ।

24 -

सम्पूर्ण गीता ज्ञान ( संक्षिप्त ) : ।

इस पुस्तक में शास्त्री जी ने समस्त गीता के विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है । कोई भी व्यक्ति इस पुस्तक को पढ़ने के उपरान्त यह जान सकता है कि गीता में किन विषयों का निरुपण हुआ है । संक्षिप्त रूप में गीता के विषयों को प्रस्तुत करने के कारण यह पुस्तक विशेष रूप से लाभकारी है।

25 -

योग क्या है ? योगी कौन है ? : ।

इस पुस्तक ने योग शब्द के विषय में विशेष व्याख्याएँ प्रस्तुत की गयी है । योग वस्तुतः किसी शारीरिक व्यायाम का नाम नहीं है वरन योग वह प्रक्रिया है जिससे अंततः मनुष्य को परमात्मा की अनुभूति हो जाती है । इसलिए यह पुस्तक विशिष्ट है तथा योग के स्वरूप को सही रूप में प्रस्तुत करती है ।

26 -

सर्वधर्मान्परित्यज्य : ।

भगवदगीता के 18वें अध्याय के 66वें श्लोक में श्री भगवान ने समस्त धर्म का परित्याग करके एकमात्र उनकी शरण में जाने का आदेश दिया है । इस श्लोक की विशिष्ट व्याख्या इस पुस्तक में प्रस्तुत की गयी है ।

27 -

कर्मण्येवाधिकारस्ते : ।

भगवदगीता के दूसरे अध्याय के 47वें श्लोक की विषद व्याख्या इस पुस्तक में की गयी है । यह श्लोक विशेष रूप से अनेक मनीषियों, विचारकों, का प्रेरणास्रोत रहा है । इसलिए इस श्लोक पर लिखी गयी इस पुस्तक में कर्म पर विशेष प्रस्तुति की गयी है तथा कर्म के माध्यम से परमात्मा की अनुभूति का क्रम वर्णित किया गया है ।

28 -

तर्क से तत्व का विनिश्चय : ।

वर्तमान समय में मनुष्य बहुत तार्किक हो गया है । इस कारण उन साधकों के लिए यह पुस्तक विशेष रूप से उपयोगी है , जो तर्क से परमात्मा की अनुभूति करना चाहते है । इस कारण शास्त्री जी ने तर्क से तत्त्व का विनिश्चय नामक पुस्तक लिखी है ।

29 -

जित देय तित आप : ।

परमात्मा सर्वत्र विराजमान है । हम उसे नहीं देख पाते है । यह हमारे समीप और हमारे चरों ओर वातावरण में भी है । परन्तु हम उसे नहीं देख पा रहे है । यह हमारी कमी है । जब मनुष्य सर्वत्र परमात्मा की चेष्टा क्रिया कार्य की अनुभूति कर लेता है । तभी उसे परमात्मा की अनुभूति हो जाती है । इस कारण इस विषय पर लिखी गयी पुस्तक विशिष्ट है ।

30 -

भ्रष्टाचार कैसे समाप्त होगा ? : ।

वर्तमान समय में भ्रष्टाचार का सर्वत्र बोलबाला है और यह अवगुण सर्वत्र व्याप्त है। शास्त्री जी के द्वारा अध्यात्मिक तथ्यों का प्रकटीकरण करके इस पुस्तक का लेखन किया गया है । वस्तुतः यदि मनुष्य यह विचार कर ले कि हम जो भ्रष्टाचार कर रहें हैं उससे उपार्जित धन हमारे साथ नहीं जाएगा वरन कर्म जायेंगे तो भ्रष्ट आचरण छोड़ देगा । इसलिए यह पुस्तक विशिष्ट है ।

31 -

सत्य को जानें और मुक्त हों : ।

सत्य क्या है ? और असत्य क्या है ? इस तथ्य का विनिश्चय करने में बहुत से ज्ञानवान पुरुष भी अमित हो जाते है । इसलिए सत्य और असत्य की व्याख्या करके सत्य का अनुगमन करके परमात्मा की अनुभूति कैसे हो सकती है ? इस विषय को इस पुस्तक में विशेष रूप से वर्णित किया गया है ।

32 -

बुद्धि कैसे स्थिर होगी ? : ।

मनुष्य जो भी कर्म करता है , उसका विनिश्चय बुद्धि के द्वारा होता है । वस्तुतः हमारा जो कार्य होता है वह बिना बुद्धि के निश्चय के कदापि नहीं होता है । इसलिए जिस पुरुष की बुद्धि अस्थिर रहती है उस पुरुष के समस्त कर्म भी सम्यक प्रकार नहीं होते और न ही वह अपने जीवन के परम उद्देश्य परमात्मा की अनुभूति कर पाता है । स्थिर प्रज्ञ विषय को आधार मानकर लिखी गयी यह पुस्तक विशिष्ट है तथा बुद्धि कैसे स्थिर होगी ? इस तथ्य को निरुपित करने के कारण विशेष लाभकारी है ।

33 -

संशय से पूर्ण निवृत्ति : ।

संशय मनुष्य के जीवन में बहुत बाधक होता है और विशेष कर जो मनुष्य साधना के पथ पर चलना चाहता है उसे अनेक प्रकार के संशयों का सामना करना पड़ता है । संशय क्या है ? इस तथ्य को हमें समझना चाहिए । जब तक रजोगुण रहता है तब तक मनुष्य का संशय समाप्त नहीं होता । सत्य गुण के प्रबलता से मनुष्य का संशय उसी प्रकार समाप्त होता है जैसे प्रकाश में अन्धकार का विलय हो जाता है । संशय की निवृत्ति कैसे हो? इस विषय पर लिखी गयी पुस्तक विशिष्ट है ।

34 -

परमात्मा की अनुभूति के विशिष्ट साधन : ।

मानव जीवन का एक मात्र उद्देश्य परमात्मा की अनुभूति करना है जो मनुष्य अपने जीवन में परमात्मा की अनुभूति नहीं कर परोहै उनका जीवन निरर्थक रहता है । अथात् सार्थक नहीं हो पाता है । परमात्मा को अनमति की प्रक्रिया त्या है ? और किन - किन साधनों से परमात्मा की अनुभूति हती है उस प्रक्रिया या प्रतिपादन इस पुस्तक में विशेष रूप से किया गया है तथा परमात्मा की अनुमति के अनेक साधनों का वर्णन भगवदगीत के आधार पर हुआ है ।

35 -

ब्रह्माण्ड एवं सृष्टि रचना : ।

यह ब्रह्माण्ड जो हमारी दृष्टि में है और जिस ब्रह्माण्ड को हमारी दृष्टि देख नहीं पा रही है उस ब्रह्माण्ड की रचना भी कभी न कभी अवश्य हुई होगी । भारतीय वाङमय में सृष्टि की रचना को विशेष रूप से वर्णित किया गया है । इसलिए अनेक अध्यात्मिक ग्रंथों का आश्रय लेकर ब्रह्माण्ड को तथा सृष्टि की रचना का तथ्य इस पुस्तक में वर्णित किया गया है । इस कारण यह विशिष्ट पुस्तक है ।

36 -

सत्व , रज , तम , गुण और उनका प्रभाव : ।

प्रत्येक मनुष्य में तीन गुण रहते हैं , जिन्हे सत्त्व, रज, तम कहा जाता है । जब एक गुण की प्रबलता होती है तो दो गुणों का समन हो जाता है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति में एक गुण क्रियाशील रहता है और दो गुण अक्रिय अवस्था में रहते हैं । गुणों का क्या स्वभाव ? उनका स्वरूप क्या है? तथा उनकी अवस्था क्या है ? और उनके प्रभाव से मनुष्य किन कर्मो का सम्पादन करता है ? इस विषय पर लिखी गयी यह पुस्तक विशिष्ट है ।

37 -

भगवान श्रीकृष्ण की सत्ता : ।

भगवान श्रीकृष्ण के बारे में अनेक प्रकार के भ्रामक विचार हमारे समाज में व्याप्त है । कुछ लोग उन्हें सामान्य मनुष्य मानते है । अन्य कुछ लोग उन्हें महापुरुष मानते है तथा अन्य कुछ विशिष्ट लोग उन्हें परमात्मा का स्वरूप मानते है । भगवान श्रीकृष्ण क्या है ? इस तथ्य का प्रकटीकरण शास्त्रों के आधार पर इस पुस्तक में किया गया है तथा उनके वास्तवकि स्वरूप का प्रतिपादन हुआ है ।

38 -

संसार में ग्यारह प्रकार के मनुष्य हैं :

इस संसार में असंख्य मनुष्य है । मनुष्यों की निश्चित गणना तो संभव नहीं है परन्तु यह विशेष बात है कि प्रत्येक मनुष्य की प्रवृत्ति, चेष्टा, कार्य, स्वाभाव आदि पृथक् - पृथक प्रतीत होते हैं। प्रत्येक मनुष्य की प्रवृत्ति, चेष्टा, कार्य, स्वभाव को आधार मानकर मनुष्ण के 11 प्रकारों का वर्गीकरण इस पुस्तक में हुआ है । मनुष्ण के कार्य, चेष्टा, प्रवृत्ति, स्वाभाव को देखकर यह निश्चय हो जाता है कि मनुष्य किस गुण से प्रभावित है? इस कारण यह पुस्तक विशिष्ट है ।

39 -

श्रीमद्भगवद्गीता एवं धम्मपदं :

भगवान बुद्ध द्वारा लिखी गयी धम्मपद पुस्तक विशिष्ट है जो बौद्ध धर्म के साधकों के लिए प्रेरणास्त्रोत रही है । भगवद्गीता और धम्मपद के विषय में क्या समानता है ? इस तथ्य का वर्णन इस पुस्तक में किया गया है ।

40 -

आध्यात्मिक जीवन के 200 उपयोगी प्रश्न :

प्रत्येक मनुष्य अध्यात्म के विषय में बहत कुछ जानना चाहता है तथा उसकी यह जिज्ञासा रहती है कि वह अध्यात्मिक विषयों के बारे में कुछ ज्ञान प्राप्त करे । इसलिए शास्त्री जी द्वारा लगभग सभी अध्यात्मिक विषयों का निरुपण इस पुस्तक में किया गया है तथा 200 उपयोगी प्रश्नों के उत्तर देकर संक्षेप में अध्यात्म विषय को निरूपित करने का प्रयास हुआ है । इस कारण यह पुस्तक विशिष्ट है ।

41 -

सम्पूर्ण गीतासार :

जो मनुष्य सम्पूर्ण गीता के सार को जानना चाहते है अर्थात गीता को यथावत पढ़ना चाहते है उनके लिए सरल भाषा में सम्पूर्ण गीतासार नामक पुस्तक लिखी गयी है । जिसको अध्ययन से भगवद्गीता के वास्तविक स्वरुप का दर्शन होता है ।

42 -

Easy process of Liberation :

यह पुस्तक अंग्रेजी भाषा में मुक्ति का सहज उपाय नामक पुस्तक का रूपान्तरण है, जो हिन्दी भाषी साधक नहीं है उनके लिए यह पुस्तक विशेष रूप में उपयोगी है । मन क्या है ? बुद्धि क्या है ? अहकार क्या है ? जीवात्मा क्या है ? इस तथ्य का इस पुस्तक में अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुतिकरण हुआ है ।

43 -

ब्रह्मसूत्र का रहस्य :

भगवान वेदव्यास का यह विशिष्ट ग्रंथ है । जिस पर वैदिक सनातन धर्म के पांच प्रमुख आचार्य शंकराचार्य , रामानुजाचार्य , मध्वाचार्य , बल्लभाचार्य , निम्वार्काचार्य आदि ने भाष्य लिखे है तथा आचार्य का पद प्राप्त किया है । भगवान वेदव्यास द्वारा लिखा गया यह ग्रन्थ विशिष्ट है । इस पर सहज भाषा में शास्त्री जी द्वारा एक सहज टिका लिखी गयी है। जो सहज रूप से ब्रह्मसूत्र के रहस्य का दर्शन कराती है ।

44 -

योगदर्शन की सहज व्याख्या :

महर्षि पतंजलि ने दार्शनिक ग्रंथ योगदर्शन को सूत्र रूप में लिखा है । योगदर्शन पर अनेक महानुभागों ने भाष्य लिखें है । व्यास नामक भाष्य बहुत विशिष्ट माना जाता है । शास्त्री जी ने भी योगदर्शन की सहज व्याख्या नामक यह पुस्तक लिखी है , जो साधकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि इसमें प्रयोगात्मक तथ्यों का विशेष वर्णन हुआ है । योगदर्शन पर लिखी गयी यह पुस्तक योग विषय की विशिष्ट पुस्तक है , जो योग शब्द का अर्थ भी निरूपित करती है । इसमें भगवद्गीता के श्लोकों का भी आश्रय लिया गया है ।

45 -

रामचरित मानस भगवदगीता का प्रतिरूप है :

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिया गया यह विशिष्ट ग्रंथ रामचरित मानस आज । भारतीय समाज का विशिष्ट और लोकप्रिय ग्रंथ है । समग्र भारत में इसका अध्ययन अध्यापन विशेष रूप से होता है । अनेक महानुभाव रामकथा के रूप में इसका आश्रय लेते है । इसमें अध्यात्मिक तथ्यों को गोस्वामी जी ने विशिष्ट रूप से वर्णित किया है । वस्तुतः रामचरित मानस के समस्त आध्यात्मिक पक्ष भगवदगीता के सिद्धांतों के आधार पर ही वर्णित किये गये हैं इसलिए इसे भगवद्गीता का प्रतिरूप माना जाता है । मानस के दोहों और भगवद्गीता को श्लोकों की तुलना के रूप में पुस्तक प्रस्तुत की गयी यह पुस्तक विशिष्ट है ।

46 -

विवेकचूडामणि भाष्य :

भगवान शंकराचार्य द्वारा लिखी गयी विवेक चूड़ामणि नामक पुस्तक साधना के उच्चस्तरीय विद्वानों के लिए विशेष लाभकारी है तथा समस्त आध्यात्मिक तथ्यों का निरुपण करती है । विवेक चूड़ामणि के हिन्दी अनुवाद उपलब्ध है , परन्तु इसकी व्याख्या के रूप में पुस्तकों का अभाव है । इस कारण शास्त्री जी के द्वारा विवेक चूड़ामणि भाष्य को सहज रूप में वर्णित किया गया है तथा शंकाराचार्य के सिद्धान्तों का सहज रूप से निरुपण हुआ है ।

47 -

कठोपनिषद दर्शन :

वैदिक वाङ्मय चार आयाम है । जिन्हें हम चार भाग भी कह सकते है । पहला भाग चार संहिताओं के रूप में है । दूसरा आरण्यक ग्रंथो के रूप में है । तीसरा ब्राह्मण ग्रंथों के रूप में है और चौथा उपनिषदों के रूप में है जो वैदिक वाङ्मय का ज्ञानकाण्ड माना जाता है तथा पराविद्या का विशिष्ट स्वरूप भी है । उपनिषदों में कठोपनिषद का विशेष स्थान है । इसलिए शास्त्री जी ने कठोपनिषद पर यह पुस्तक सरल भाषा में प्रस्तुत की है , जो प्रयोगात्मक स्वरूप क दर्शन कराती है ।

48 -

वेदों के तत्त्व का विश्लेषण :

वेद ही निखिल धर्म के मूल स्वरूप है और यह दुख की बात है कि आज हम वेदों के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी रखते है । वेद क्या है ? उनका विषय क्या है ? और उनसे मानव समाज को क्या लाभ है ? आदि-आदि विषय को निरुपित करते हुए वेदों के तत्व का विश्लेषण नामक पुस्तक प्रस्तुत की गयी है जो सभी के लिए उपयोगी है । हमारे वैदिक सनातन धर्म का आधार भी वेद है । इसलिए वेदों के तत्व का विश्लेषण इस पुस्तक में हुआ है ।

49 -

मत , पंथ का आग्रह छोड़ें तत्त्वदर्शी बने :

जब तक मनुष्य में मत, पंथ , सम्प्रदाय , जाति , धर्म आदि का भाव रहता है तब तक मनुष्य साधक नहीं हो पाता है और जब यह भाव समाप्त हो जाता है कि न तो कोई मत है न कोई पथ है , न कोई सम्प्रदाय है , न कोई जाति है , न कोई धर्म है । सभी मनुष्य एक समान है , सभी हमारी तरह है । यह भाव जब प्रबल हो जाता है तब मनुष्य मनुष्य नहीं रहता । वह परमात्मा के स्वरूप में हो जाता है । क्यूंकि परमात्मा का कोई मत , पंथ, धर्म नहीं है । इसलिए जब तक मत , पंत और धर्म रहता है तब तक मनुष्य को तत्व की उपलब्धि नहीं होती है ।

50 -

भगवान कपिल का सांख्यदर्शन :

भगवान कपिल ने अपनी माता देवहूति को सांख्य का उपदेश दिया था । इस उपदेश को श्रीमदभागवत महापुराण में वर्णित किया गया है । यह विशिष्ट उपदेश भगवान कपिल के द्वारा दिया गया है । इसी को पुस्तक रूप में शास्त्री जी द्वारा वणित किया गया है और अनुभूति की प्रक्रिया को विशेष स्वरूप प्रदान किया गया है ।

51 -

ब्रह्मर्षि नारद के भक्ति सूत्र :

ब्रहार्षि नारद भगवान के परम भक्त है और ये प्रत्येक पल भगवान का गुणानुवाद किया करते है उनके द्वारा नारद भक्त्ति सूत्र नामक पुस्तक का प्रणयन किया गया है । नारद भक्ति सूत्र , सूत्र रूप में प्रस्तुत की गयी एक छोटी पुस्तक है । इसी की व्याख्या को शास्त्री जी द्वारा सहज रूप में प्रस्तुत किया गया है तथा भक्ति के स्वरूप को विधिवत निरूपित किया गया है ।

52 -

भगवद्गीता मूल :

जो मनुष्य भगवद्गीता का पाठ करना चाहते हैं उनके लिए यह पुस्तक उपयोगी है।

53 -

भगवद्गीता मूल एवं भावार्थ :

भगवदगीता का पाठ करने के लिए और उसको सहज रूप से ग्रहण करने के लिए हिन्दी भाषा में भगवद्गीता के मूल श्लोकों और उसके सहज अर्थ इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है ।

54 -

भगवदगीता तत्त्व चिंतन :

भगवदगीता का विषय क्या है ? और उस विषय में विशेष तथ्य क्या है ? इस तथ्य का निरूपण इस पुस्तक में विशेष प्रकार से किया गया है । परमात्मा की अनुभूति की प्रक्रिया का विशेष निरुपण भगवद्गीता का प्रमुख विषय है । इसलिए जिन स्थलों पर परमात्मा की अनुभूति की प्रक्रिया को वर्णन किया गया है । उन विषयों को इस पुस्तक में विशेष रूप से प्रतिपादित किया गया है । इसलिए भगवद्गीता के तत्व का मूल चिंतन इस पुस्तक में समाहित है ।